मेरे अनन्य : डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय
आखिरकार वह नौबत आ ही गयी, जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी। ...अकस्मात् मरण ! फिर संस्मरण। एक मित्र का मरण और दूसरे का संस्मरण...! बहुत आत्मीय लोगों पर लिखते हुए कई-कई बार कलेजा मुँह को आता है। ऐसे संस्मरण लिखने के क्रम में भी मरण को छूकर निकलने वाली प्रक्रिया होती रहती है तिल-तिल कर। निचोड़ यह कि 'एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।' इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम.ए. करते हुए हम कुछ लोग परिचित होते ही कब मित्र हो गए, कुछ याद नहीं। उन कुछ लोगों में अन्यतम थे डॉ. पाण्डेय। मैं उन दिनों वामपंथी सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहता था। इसके विपरीत वे सदा एक संघर्षशील आस्थावान विद्यार्थी के रूप में ही दिखते थे। परीक्षा का परिणाम अंततः उनके पक्ष में था। उस वर्ष सर्वाधिक अंक पाने का कीर्तिमान उन्होंने बनाया। हालांकि किसी तकनीकी कमी के चलते गोल्ड मेडल उन्हें नहीं मिला। हम लोगों ने हिंदी विभाग के सामने की घास में बैठ के फूलों और पत्तियों की माला तैयार की और डॉ. पाण्डेय को पहना दी......हो गया मूर्द्धाभिषेक..! पाण्डेय जी अत्यंत गंभीर-माथे की शिकन उसी तरह। इस क्रम में यह उल्लेख करना आवश्यक है...