मेरे अनन्य : डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय

 आखिरकार वह नौबत आ ही गयी, जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी। ...अकस्मात् मरण ! फिर संस्मरण। एक मित्र का मरण और दूसरे का संस्मरण...! बहुत आत्मीय लोगों पर लिखते हुए कई-कई बार कलेजा मुँह को आता है। ऐसे संस्मरण लिखने के क्रम में भी मरण को छूकर निकलने वाली प्रक्रिया होती रहती है तिल-तिल कर। निचोड़ यह कि 'एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।' इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम.ए. करते हुए हम कुछ लोग परिचित होते ही कब मित्र हो गए, कुछ याद नहीं। उन कुछ लोगों में अन्यतम थे डॉ. पाण्डेय। मैं उन दिनों वामपंथी सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहता था। इसके विपरीत वे सदा एक संघर्षशील आस्थावान विद्यार्थी के रूप में ही दिखते थे। परीक्षा का परिणाम अंततः उनके पक्ष में था। उस वर्ष सर्वाधिक अंक पाने का कीर्तिमान उन्होंने बनाया। हालांकि किसी तकनीकी कमी के चलते गोल्ड मेडल उन्हें नहीं मिला। हम लोगों ने हिंदी विभाग के सामने की घास में बैठ के फूलों और पत्तियों की माला तैयार की और डॉ. पाण्डेय को पहना दी......हो गया मूर्द्धाभिषेक..! पाण्डेय जी अत्यंत गंभीर-माथे की शिकन उसी तरह। इस क्रम में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि पाण्डेय जी हमारी राजनीतिक विचारधारा से असहमत होते हुए भी गीतों के गायन में हमारे साथ रहते थे। बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मंचित हुए कुछ नाटकों में उन्होंने अभिनय भी किया। भारतेंदु जन्मशती के आयोजन के अंतर्गत एक कवि सम्मलेन हुआ। मुझे भारतेन्दु की भूमिका मिली और क्षमा शंकर जी को जयशंकर 'प्रसाद' की। यह आयोजन 'मालवीय भवन' में संभवतः पहली जनवरी 1986 को संपन्न हुआ था। इस कार्यक्रम की खासियत यह थी कि दर्शकों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के आचार्यों के साथ तत्कालीन कुलपति प्रो. आर. पी. रस्तोगी भी उपस्थित थे। कुछ ही दिनों पहले कुलपति महोदय ने हिन्दी विभाग को 'गुण्डा विभाग' कहा था, किन्तु 'मालवीय भवन' की प्रस्तुति देखकर उन्होंने घोषणापूर्वक हिन्दी विभाग की उस संज्ञा को वापस लिया। इससे पहले लमही में 1983 जब नुक्कड़ नाटक हुआ, तो वे गायन में सहयोग कर रहे थे। दरअसल डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक व्यक्तित्व के स्वामी थे। जब फोन सहज सुलभ नहीं थे, तब उनकी खूबसूरत इबारत वाले पोस्ट कार्ड आते थे मेरे पास। फोन सुलभ हुए, तो हर तीज-त्योहार पर उनकी शुभकामनाएँ आतीं। आज, जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ; उनसे जुड़ी असंख्य छवियाँ दिमाग में नाच रही हैं- बेसिलसिला। ऐसा नहीं कि उनके जीवन में दुःख और संघर्ष नहीं थे। थे, पर उनकी अभिव्यक्ति करते कभी उन्हें नहीं देखा गया। दुखों को भीतर ही छिपायें रखने की वजह से उनके माथे पर कुछ सलवटें स्थायी रूप से बनी रहतीं। कभी कोई पुरस्कार या उपलब्धि मिलती, तो विनोद पूर्वक उसकी सूचना देते। अवस्था की दृष्टि से वे मुझसे थोड़े से बड़े थे, पर हमेशा मुझे 'भैया' ही कहते थे। बदले में मैं भी उन्हें 'भैया' कहता। हिंदी साहित्य सम्मलेन से उन्हें 'महोपाध्याय' की उपाधि मिली, तो उसकी सूचना इस तरह मुझे दी "भैया, सम्मलेन वालों ने 'पाण्डेय' से 'उपाध्याय' बना दिया।" सन् 1985 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पहली बार मानविकी में जे.आर.एफ. की देश स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित की। आयु सीमा अट्ठाईस वर्ष थी और मेरा अट्ठाईसवाँ वर्ष था। अर्थात् सिर्फ एक मौका था मेरे पास। मैंने आवेदन तो कर दिया था, पर जिस दिन परीक्षा होनी थी, मैंने बिरला छात्रावास के 108 नंबर कमरे में छेदी से ताला लगवा लिया - यह मानकर कि एक ही मौका है और तैयारी है नहीं। परीक्षा दूँगा, तो चयन तो होगा नहीं, खामखा बदनामी होगी। परीक्षा का समय हुआ तो डॉ. पाण्डेय की आवाज : 'भैया, गो कि आप पर हाथ उठाना मेरे लिए नामुमकिन है, मगर आज आप परीक्षा नहीं देंगे, तो मल्ल-युद्ध भी कर सकता हूँ।'

संकट मोचन पर पंडित जसराज का गायन होना था। हम लोग जसराज जी को सुनने गए- कंधे पर झोला लटकाए डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय, डॉ. देव और मैं। साथ में काशीनाथ जी भी थे। उस समय वे विभागाध्यक्ष थे, पर बिना किसी भेद-दृष्टि के वे हम लोगों के प्रति सख्यभाव ही रखते थे। संकट मोचन के संगीत समारोह में जूते-चप्पल रखने के लिए स्टैंड होते थे। हम लोग पहुँचे, तो सारे स्टैंड भर गए थे। दूसरी सूचना यह मिली कि जसराज जी 'भैरव' गायन करेंगे, लिहाजा रात के बारह बजे के बाद वे मंच पर आयेंगे। रात के बारह बजने का इंतजार तो हम लोग करते रहे- खड़े-खड़े, पर जैसे ही जसराज जी ने गायन शुरू किया, मैं और देव-दोनों लोग आगे बैठे श्रोताओं की भीड़ में शामिल होने को बेकरार होने लगे। अब समस्या यह थी कि जूते-चप्पल कहाँ रखे जायें...?
'जूतों की देख-रेख मैं करूँगा।' -डॉ. पाण्डेय जी ने हम लोगों को आश्वस्त किया।
जसराज जी का भैरव गायन सूर्योदय होने तक होता रहा। मैं और देव तल्लीन होकर सुनते रहे जूतों की चिंता से बेफिक्र। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, तो हम दोनों को जूतों का ख्याल आया। अरे! ...न तो पाण्डेय जी कहीं दिखे और न ही काशीनाथ जी। 'चलो मित्र, जूते गये, तो गए, हम लोगों ने जसराज जी का प्रत्यक्ष गान तो सुना।' इस तरह शहीदाना भाव के साथ हम लोग पैदल चल रहे थे। तलवों में नन्हें-नन्हें कंकड़ चुभ रहे थे। इस समस्या के समाधान के लिए हम लोगों ने रिक्शे का सहारा लिया। आँखों में रतजगा चुभ रहा था और मन में शहीदों जैसे भाव लिए हम लोग 'बिरला छात्रावास' के अपने-अपने कमरे में घुसे और सो गए। नींद का पहला झोंका ही रहा होगा, तब किसी की कर्कश दस्तक सुनाई पड़ी। दरवाजा खोलने पर देखा कि क्षमा शंकर जी झोला लटकाए दिखे। झोला जाते समय तो एक औपचारिकता लग रहा था- सिर्फ झोला, पर इस समय झोला ऐसा लगा जैसे ढेरों माल असबाब भरे हों।
'भैया, परिचय पत्र लहराकर जूते खाने से बचा हूँ, आप लोगों के जूतों को बचाने के लिए।' - हँसते हुए डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय।
मित्रों के प्रति उनके समर्पण भाव की यह बानगी भर है। अभी तो डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय के कृतित्व और व्यक्तित्व पर बहुत कुछ लिखना शेष है, किन्तु फिरहाल इतना ही। यह 'इति' नहीं 'अथ' है।

डॉ. शिव शंकर मिश्र
पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग, जनता महाविद्यालय अजीतमल, औरैया।
सम्प्रति- संड़वा खुर्द, कांटी, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
मो. 9411016120


साहित्य-स्रोत एवं साभार-
डॉ. भुवनेश्वर दूबे के कुशल संपादन में डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित महत्त्वपूर्ण कृति ‘साहित्य पुरुष’ से साभार।
साभार : डॉ. क्षमा शंकर पाण्डेय

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अंतिम उच्चारण - शिवशंकर मिश्र

स्मृति-प्रदीप

बाबा की उघन्नी- शिवशंकर मिश्र