आखिरकार वह नौबत आ ही गयी, जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी। ...अकस्मात् मरण ! फिर संस्मरण। एक मित्र का मरण और दूसरे का संस्मरण...! बहुत आत्मीय ...
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कुछ शब्दचित्र हैं यहाँ। विकास की अन्धी दौड़ में ये हाशिये की आख्यायें हैं और आख्यान भी!
आखिरकार वह नौबत आ ही गयी, जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी। ...अकस्मात् मरण ! फिर संस्मरण। एक मित्र का मरण और दूसरे का संस्मरण...! बहुत आत्मीय ...