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आख्यान
कुछ शब्दचित्र हैं यहाँ। विकास की अन्धी दौड़ में ये हाशिये की आख्यायें हैं और आख्यान भी!
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SHIV SHANKAR MISHRA
1857 : सामासिकता का लोकपाठ - शिव शंकर मिश्र
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"बादल को घिरते देखा है' (नागार्जुन) और "मेघदूतम् (कालिदास)
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जब-जब देखा : सन्दर्भ नामवर सिंह
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अवधी कवि पं. रामगुलाम त्रिपाठी
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स्मृति-प्रदीप
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पाठ और पुनः पाठ- शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण'- यथार्थ की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति करती बहुविमर्शी कहानियों का संवेदनाधर्मी कथा-लोक
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सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'
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स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन
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मुमुक्षु
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हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ... शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा
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