डॉ. शिव शंकर मिश्र (स्थापना वर्ष: 2010)
कुछ शब्दचित्र हैं यहाँ। विकास की अन्धी दौड़ में ये हाशिये की आख्यायें हैं और आख्यान भी!
'आख्यान' की आधारशिला सन् 2010 में मूर्धन्य कथाकार डॉ. शिव शंकर मिश्र जी द्वारा रखी गयी थी- मौलिक चिंतन और गंभीर सामाजिक वैचारिकी के अनूठे और निष्पक्ष मंच के रूप में।
पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय की यह अनवरत वैचारिक यात्रा इस बात की प्रत्यक्ष गवाह है कि इस मंच ने हमेशा लोक-संवेदना और गंभीर विमर्श को एक आत्मीय आकाश दिया है। उन की कालजयी रचनाएँ और अलौकिक चेतना साहित्य जगत् में अक्षय वागर्थ-चेतना की भाँति अमर रहेंगी।
उनका संपूर्ण लेखन मानवीय संवेदनाओं के सूक्ष्म राग-विराग और हाशिए के समाज की जिजीविषा का प्रामाणिक दस्तावेज है। यहाँ उनकी अथक साहित्य-साधना और पावन स्मृतियों को समर्पित एक अक्षुण्ण डिजिटल अभिलेख बनाने का प्रयास किया गया है।
- अन्तिम उच्चारण
- बाबा की उघन्नी
- मूरतें
- मुनुआ की वीरगति
- पखावज
- मुजरिम
- हराम की नहीं
- पात्रता
- काश होती कमीज पर कविता
- जश्न
- चिता पर मंथवा
- जालिम
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