मुमुक्षु
मुमुक्षु कई सालों तक फेरी लगाकर कपड़े बेचते-बेचते खूब पैसा कमा लेने पर भी जब रामलाल का ब्याह नहीं हुआ, तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने की ठानी। बात उन दिनों की है, जब कुलीन ब्राह्मणों के ही ब्याह हो पाते थे। रामलाल थे तो ब्राह्मण ही, लेकिन कुलीन नहीं थे। उन्होंने ज्ञान की सारी पोथियाँ खरीद डालीं। दर्जा दो पास थे रामलाल। अक्षर-अक्षर जोड़ कर उन्होंने सारी पोथियाँ बाँच डालीं और सबका निचोड़ यह निकला कि उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। काशी गये और ले लिया संन्यास। दंड भी ले लिया, कमंडल भी। पानी में खड़े रहे पूरी रात। पहले जाड़ा लगा, फिर शरीर सुन्न सा हो गया। कभी कभी हवा के झोंकों के संग लहरें घाट की सीढ़ियों से टकरा जातीं। लंगरों से बॅंधी नावें ‘छप-छप’ की आवाज करते हुए हिल जातीं। मछलियाँ शरीर से टकरातीं। उनकी कोमल छुअन महसूस करते। रामलाल के देखते-देखते विदेशी सैलानियों के कई जोड़े नावों के निचले हिस्से में परस्पर एकाकार हो गये थे। बहुत अजब-गजब लग रहा था। देर रात को गुरु के आदेश पर गंगा के ठंडे पानी से बाहर निकले और उन्हीं के साथ संन्यास लेने वाले दूसरे मुमुक्षु। धुँधलके में सब छाया की तरह दिख र...