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मुमुक्षु

मुमुक्षु कई सालों तक फेरी लगाकर कपड़े बेचते-बेचते खूब पैसा कमा लेने पर भी जब रामलाल का ब्याह नहीं हुआ, तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने की ठानी। बात उन दिनों की है, जब कुलीन ब्राह्मणों के ही ब्याह हो पाते थे। रामलाल थे तो ब्राह्मण ही, लेकिन कुलीन नहीं थे। उन्होंने ज्ञान की सारी पोथियाँ खरीद डालीं। दर्जा दो पास थे रामलाल। अक्षर-अक्षर जोड़ कर उन्होंने सारी पोथियाँ बाँच डालीं और सबका निचोड़ यह निकला कि उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। काशी गये और ले लिया संन्यास। दंड भी ले लिया, कमंडल भी। पानी में खड़े रहे पूरी रात। पहले जाड़ा लगा, फिर शरीर सुन्न सा हो गया। कभी कभी हवा के झोंकों के संग लहरें घाट की सीढ़ियों से टकरा जातीं। लंगरों से बॅंधी नावें ‘छप-छप’ की आवाज करते हुए हिल जातीं। मछलियाँ शरीर से टकरातीं। उनकी कोमल छुअन महसूस करते। रामलाल के देखते-देखते विदेशी सैलानियों के कई जोड़े नावों के निचले हिस्से में परस्पर एकाकार हो गये थे। बहुत अजब-गजब लग रहा था। देर रात को गुरु के आदेश पर गंगा के ठंडे पानी से बाहर निकले और उन्हीं के साथ संन्यास लेने वाले दूसरे मुमुक्षु। धुँधलके में सब छाया की तरह दिख र...

मुनुआ की वीरगति

मुनुआ की वीरगति सुबह-सुबह गाँव में बमचख मच गया। मुनुआ चलते ट्रक से कूद पड़ा और नचकऊ पाँडे़ दरवाजे-दरवाजे थाली पीटकर फरियाद कर रहे हैं। ‘अररऽरऽ।‘ जिसने जहाँ सुनी यह खबर, वह वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया। अभी सूरज निकला भी नहीं था। लोग गोरुआरी-बछेरुआरी में लगे थे या लोटा लेकर शौच-मैदान के लिए निकल रहे थे। सब चौंक गये। ‘मरा कि बचा मुनुआ?‘ ‘मरा होता, तो नचकऊ किरिया-करम करते कि टाठी पीटकर गौंतरी लगाते?' ‘तो काहे की फरियाद कर रहे हैं नचकऊ?' ‘नचकऊ का कहना है कि गाँव के लड़कों ने धक्का देकर उनके लड़के को चलतिया टरक से गिरा दिया।’  - जगह-जगह बातें कर रहे थे लोग। ‘पर-पंचाइत का जमाना अब कहाँ रहा पाँड़े? आज-कल के लड़के कहो मानें कहो न मानें पंचों की बात। लेकिन ठीक है। तुम पंचाइत बैठा रहे हो, तो आ रहा हूँ मैं भी।‘ - गाय दुहकर लेरुआ ढीलते हुए बोले कामता पाठक। छोटे बच्चे नचकऊ के पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके लिए अपूर्व दृश्य था यह। उनमें से कई अभी सोकर उठे थे। आँखें मलते बच्चे सम्मोहित हुए चले जा रहे थे नचकऊ के पीछे-पीछे। सोनबरसा गाँव के लड़कों का वह झुंड रामलीला देखने जा रहा था, शंकरगढ़ की रामलीला। होने को ...

जश्न : शिव शंकर मिश्र

सुबह के आठ बजते-बजते रोज की तरह खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का उटँग पाजामा पहनकर अनंतराम दफ्तर के लिए रवाना हो गये- साइकिल से। एक बीड़ा पान वे घर से खाकर चले और दूसरा बीड़ा गमछे के छोर में बाँध लिया। अनंतराम का घर गाँव में था और दफ्तर शहर में। गाँव से शहर की दूरी चौबीस किलोमीटर थी। अनंतराम एक बीड़ा पान मुँह में दबाकर यह दूरी साइकिल से डेढ़-दो घंटों में पूरी कर लेते थे। लौटते समय फिर यही सिलसिला। अब की बार गमछे के छोर में बँधा पान का बीड़ा काम आता। यों अनंतराम की नौकरी में कोई ऐसी बाध्यता नहीं थी कि खाकी कमीज पहनी जाय, फिर भी वे हमेशा खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का सफेद पाजामा पहनते थे। दरअसल खाकी कमीज पहनने की वजह यह थी कि अनंतराम थे तो चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी, पर उनका कोई रुतबा नहीं था, ऐसा उन्हें लगता था। इस वजह से वे खाकी कमीज पहनते और खुद को पुलिस के सिपाही जैसा रुतबेदार महसूस करते थे। दिन के तीन बजे तक सब कुछ सामान्य ढंग से होता रहा-रोज की तरह। तकरीबन साढ़े तीन बजे, जबकि सभी अधिकारी और कर्मचारी काफी व्यस्त हो गये थे, गेट के बाहर फूटते पटाखों, लाउडस्पीकर पर बजते हनुमान-चालीसा और बीच-बीच मे...