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1857 : सामासिकता का लोकपाठ - शिव शंकर मिश्र

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स मास संस्कृत व्याकरण की एक व्यवस्था है, जिसमें दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक समस्त पद की रचना की जाती है। यह समस्त पद एक भिन्न अर्थ देता है, जो इसमें प्रयुक्त सभी शब्दों से भिन्न होता है। भिन्न होते हुए भी यह अर्थ निकलता उन्हीं शब्दों से हैं। संस्कृति के सन्दर्भ में इसका प्रयोग दो या दो से अधिक संस्कृतियों के मेल से बनने वाली संस्कृति के अर्थ में किया जाता है। वस्तुत: अंग्रेजी के 'कम्पोजिट कल्चर' शब्द के हिन्दी अनुवाद के रुप में सामासिक संस्कृति शब्द का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतया संस्कृतियाँ सामासिक होती हैं। यद्यपि उनमें टकराव अधिक होते हैं, किन्तु दीर्घकालीन प्रक्रिया में वे टकराते-टकराते जाने-अनजाने एक-दूसरे के कुछ मूल्यों को आत्मसात करती है। इस तरह संस्कृति का समास बनता है। कौन सा तत्व कहाँ से आया, यह पहचान कठिन हो जाती है। भारतीय संस्कृति इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है। इस अत्यन्त समृद्ध और प्राचीन महादेश में बहुत पहले से दूर देशों के लोग आते रहे। कौतूहल और लोभवश वे यहाँ आये। कुछ आये और चले गये और कुछ यहीं के वासी हो गये। भारतीय संस्कृति का समास बनता रहा। इस समास...

"बादल को घिरते देखा है' (नागार्जुन) और "मेघदूतम् (कालिदास)

"मेघदूतम्" संस्कृत गीतिकाव्य परम्परा का वह सृजन है, जिसने न सिर्फ भारतीय भाषाओं की कविता को प्रभावित किया, बल्कि विश्वकविता पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा। विश्व की अधिकांश भाषाओं में इसके अनुवाद प्रकाशित हुए और इससे प्रेरित रचनाएँ भी की गयीं। 'मेघदूतम्' की विश्वव्यापी उपजीव्यता अब अध्ययन का नया विषय नहीं है। प्रस्तुत अध्ययन हिन्दी कवि नागार्जुन की कविता "बादल को घिरते देखा है" पर इस आशय से केन्द्रित है कि किस सीमा तक यह कविता 'मेघदूतम्" से प्रेरित है और समानान्तर भी, इसका अध्ययन किया जाय। नागार्जुन हिन्दी के संस्कृतज्ञ प्रगतिशील कवि रहे हैं। एक तरफ उन पर कालिदास का गहरा प्रभाव है, दूसरी तरफ वे उस प्रभाव से टकराते हुए नया सौन्दर्यबोध भी निर्मित करते हैं। उनकी यथार्थाग्रही दृष्टि "मेघदूतम्" के मिथकीय चरित्रों और स्थानों का भौतिक सत्यापन करना चाहती है: 'कहाँ गया धनपति कुबेर वह  कहाँ गयी उसकी वह अलका? नहीं ठिकाना कालिदास के  व्योमप्रवाही गंगाजल का! ढूँढा बहुत परन्तु लगा क्या  मेघदूत का पता कहीं पर?  कौन बताये वह छायामय  बरस पड़ा होगा न यहीं पर!...