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स्मृति-प्रदीप

प्रिय ज्योत्स्ना, स्नेह! प्रदीप पर लिखना काफी मुश्किल  

पाठ और पुनः पाठ- शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण'- यथार्थ की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति करती बहुविमर्शी कहानियों का संवेदनाधर्मी कथा-लोक

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अपने प्रकाशन के लगभग छः-सात वर्ष बाद शिवशंकर मिश्र 

सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'

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अन्धाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के नाम पर स्थानीयताओं के विनाश के इस दौर में

स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन

पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' के साहित्य की उग्रता

मुमुक्षु

कई सालों तक फेरी लगाकर कपड़े बेचते-बेचते खूब पैसा कमा लेने पर भी जब रामलाल का ब्याह नहीं हुआ,

हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ... शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा

समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता

'सतगुर हमसूँ रीझि करि', सन्दर्भ : प्रो0 रामनारायण शुक्ल

वह 30 जुलाई, 1983 का दिन था, जब मैं पीएच.डी. में प्रवेश के लिए 
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