संदेश

'सतगुर हमसूँ रीझि करि', सन्दर्भ : प्रो0 रामनारायण शुक्ल

वह 30 जुलाई, 1983 का दिन था, जब मैं पीएच.डी. में प्रवेश के लिए 

मुनुआ की वीरगति

सुबह-सुबह गाँव में बमचख मच गया। मुनुआ चलते ट्रक से कूद पड़ा  और  

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!

ज्या दातर पारम्परिक नारी गीतों में जीवन के जो चित्र मिलते हैं, वे 

जश्न : शिव शंकर मिश्र

सुबह के आठ बजते-बजते रोज की तरह खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का उटँग पाजामा पहनकर अनंतराम दफ्तर के लिए रवाना हो गये- साइकिल से। एक बीड़ा पान वे घर से खाकर चले और दूसरा बीड़ा गमछे के छोर में बाँध लिया। अनंतराम का घर गाँव में था और दफ्तर शहर में। गाँव से शहर की दूरी चौबीस किलोमीटर थी। अनंतराम एक बीड़ा पान मुँह में दबाकर यह दूरी साइकिल से डेढ़-दो घंटों में पूरी कर लेते थे। लौटते समय फिर यही सिलसिला। अब की बार गमछे के छोर में बँधा पान का बीड़ा काम आता। यों अनंतराम की नौकरी में कोई ऐसी बाध्यता नहीं थी कि खाकी कमीज पहनी जाय, फिर भी वे हमेशा खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का सफेद पाजामा पहनते थे। दरअसल खाकी कमीज पहनने की वजह यह थी कि अनंतराम थे तो चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी, पर उनका कोई रुतबा नहीं था, ऐसा उन्हें लगता था। इस वजह से वे खाकी कमीज पहनते और खुद को पुलिस के सिपाही जैसा रुतबेदार महसूस करते थे। दिन के तीन बजे तक सब कुछ सामान्य ढंग से होता रहा-रोज की तरह। तकरीबन साढ़े तीन बजे, जबकि सभी अधिकारी और कर्मचारी काफी व्यस्त हो गये थे, गेट के बाहर फूटते पटाखों, लाउडस्पीकर पर बजते हनुमान-चालीसा और बीच-बीच मे...

पात्रता : शिव शंकर मिश्र

गंगाधर का क्या हुआ, यह तो पहले ही जान गये थे लोग-अखबारों में छपी उस छोटी सी खबर के जरिये, लेकिन डॉक्टर मिश्र का क्या हुआ, इस सम्बन्ध में सिर्फ अफवाहें थीं। शहर के किसी भी अखबार में उनसे सम्बन्धित एक भी समाचार नहीं था, जबकि इस समय सब की जिज्ञासा के केन्द्र वे ही थे। ऐसे में स्वाभाविक था कि अफवाहों का बाजार गर्म होता। लोगों का तो यह भी कहना था कि अफवाहें ही सच हैं।... .....महामहोपाध्याय जी से डॉक्टरेट की उपाधि लेने की प्रेरणा ग्रहण की थी गंगाधर ने। ग्यारहवीं में पढ़ता था वह, जब आठ जगह से टेढ़े शरीर वाले महामहोपाध्याय जी को अचानक एक दिन सब ‘डॉक्टर साहब’ कहने लगे और कुछ ही महीनों के बाद उनकी नियुक्ति किसी डिग्री कॉलेज में हो गयी थी। विदाई के समय अष्टावक्र (पीठ पीछे सब यही कहते थे महामहोपाध्याय जी को) जी के गले से लटकते गुलाब के गजरों की महक पंडाल में फैल रही थी। उनका ललाट दिपदिपा रहा था और छात्रों के बीच बैठा गंगाधर खुद ‘डॉॅक्टर साहब’ बनने की प्रेरणा ग्रहण कर रहा था। कस्बे के महाविद्यालय से बी.ए. और एक आवासीय विश्वविद्यालय से एम.ए. कर लेने के बाद गंगाधर पी-एच.डी. के लिए गाइड की तलाश में निकल...
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