सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'
पुस्तक समीक्षा सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर' अन्धाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के नाम पर स्थानीयताओं के विनाश के इस दौर में सुधीर विद्यार्थी की किताब 'मेरे हिस्से का शहर' एक रचनात्मक प्रतिपक्ष है- स्थानीयता की तेजस्वी चिताभस्मों और जगमग स्मृतियों का संचय। सुधीर विद्यार्थी की रचनात्मकता न कल्पना का सहारा लेती है, न ही विधा की सुविधा। शुद्ध साहित्यिक लेखन लेखक का काम्य भी नहीं है। 'पहचान बीसलपुर' की तरह उनकी यह पुस्तक भी राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद की क्रान्तिकारी गतिविधियों के केन्द्र में रहे शाहजहाँपुर जनपद पर केन्द्रित है। शाहजहाँपुर लेखक का गृहजनपद है। उसकी स्मृति में वह इबारत दर्ज है, जिसमें इस शहर को 'निराली अदा' और 'अनोखी अदा' वाला शहर कहा गया है और यहाँ के बाशिन्दों का इस पर फिदा होना बताया गया है। इस किताब के जरिये लेखक यह पड़ताल करता है कि क्या सचमुच ऐसा है कि यहाँ के लोगों को मिटने में मज़ा है, गम में हॅंसी और तबाही से आशनाई है। यह न तो शाहजहाँपुर का इतिहास है, न ही क्रान्तिकारियों की जीवनी। यहाँ लेखक की केन्द्रीय चिन्ता शहर...