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सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'

पुस्तक समीक्षा सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर' अन्धाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के नाम पर स्थानीयताओं के विनाश के इस दौर में सुधीर विद्यार्थी की किताब 'मेरे हिस्से का शहर' एक रचनात्मक प्रतिपक्ष है- स्थानीयता की तेजस्वी चिताभस्मों और जगमग स्मृतियों का संचय। सुधीर विद्यार्थी की रचनात्मकता न कल्पना का सहारा लेती है, न ही विधा की सुविधा। शुद्ध साहित्यिक लेखन लेखक का काम्य भी नहीं है। 'पहचान बीसलपुर' की तरह उनकी यह पुस्तक भी राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद की क्रान्तिकारी गतिविधियों के केन्द्र में रहे शाहजहाँपुर जनपद पर केन्द्रित है। शाहजहाँपुर लेखक का गृहजनपद है। उसकी स्मृति में वह इबारत दर्ज है, जिसमें इस शहर को 'निराली अदा' और 'अनोखी अदा' वाला शहर कहा गया है और यहाँ के बाशिन्दों का इस पर फिदा होना बताया गया है। इस किताब के जरिये लेखक यह पड़ताल करता है कि क्या सचमुच ऐसा है कि यहाँ के लोगों को मिटने में मज़ा है, गम में हॅंसी और तबाही से आशनाई है। यह न तो शाहजहाँपुर का इतिहास है, न ही क्रान्तिकारियों की जीवनी। यहाँ लेखक की केन्द्रीय चिन्ता शहर...

स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन

स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' के साहित्य की उग्रता से हिन्दी-जगत् सुपरिचित है। यह उग्रता रूढ़ियों, पाखण्डों, सामाजिक विडम्बनाओं और साम्राज्यवादी लूट के प्रति है। यहाँ 'स्नान का फल' नामक कहानी के माध्यम से उग्र-साहित्य की विशिष्टता के रेखांकन का एक प्रयास किया जा रहा है। यह कहानी उनके संग्रह ‘बलात्कार’ (मीरजापुर, 1927) में संकलित है। इससे पूर्व यह 'आज' (9 सितम्बर, 1925) में प्रकाशित हो चुकी थी। इस तरह मोटे तौर पर यह डॉ. राम विलास शर्मा के द्वारा निर्दिष्ट हिन्दी नवजागरण के तीसरे चरण की रचना है। यद्यपि डॉ. शर्मा 1920 तक ही द्विवेदी-युग अथवा हिन्दी नवजागरण का तीसरा चरण मानते हैं, लेकिन इसी क्रम वे आगे लिखते हैं- ' इस युग की सही पहचान तभी हो सकती है, जब हम एक तरफ गदर और भारतेन्दु युग से उसका सम्बन्ध पहचानें और दूसरी तरफ छायावादी युग, विशेष रूप से निराला के साहित्य, से उसके सम्बन्ध पर ध्यान दें।'  (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण', पृ. 15) वस्तुतः साहित्यिक प्रवृतियाँ और जागृतिमूलक आन्दोलनों की आवृत्तियाँ किसी एक दिन या ...

मुमुक्षु

मुमुक्षु कई सालों तक फेरी लगाकर कपड़े बेचते-बेचते खूब पैसा कमा लेने पर भी जब रामलाल का ब्याह नहीं हुआ, तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने की ठानी। बात उन दिनों की है, जब कुलीन ब्राह्मणों के ही ब्याह हो पाते थे। रामलाल थे तो ब्राह्मण ही, लेकिन कुलीन नहीं थे। उन्होंने ज्ञान की सारी पोथियाँ खरीद डालीं। दर्जा दो पास थे रामलाल। अक्षर-अक्षर जोड़ कर उन्होंने सारी पोथियाँ बाँच डालीं और सबका निचोड़ यह निकला कि उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। काशी गये और ले लिया संन्यास। दंड भी ले लिया, कमंडल भी। पानी में खड़े रहे पूरी रात। पहले जाड़ा लगा, फिर शरीर सुन्न सा हो गया। कभी कभी हवा के झोंकों के संग लहरें घाट की सीढ़ियों से टकरा जातीं। लंगरों से बॅंधी नावें ‘छप-छप’ की आवाज करते हुए हिल जातीं। मछलियाँ शरीर से टकरातीं। उनकी कोमल छुअन महसूस करते। रामलाल के देखते-देखते विदेशी सैलानियों के कई जोड़े नावों के निचले हिस्से में परस्पर एकाकार हो गये थे। बहुत अजब-गजब लग रहा था। देर रात को गुरु के आदेश पर गंगा के ठंडे पानी से बाहर निकले और उन्हीं के साथ संन्यास लेने वाले दूसरे मुमुक्षु। धुँधलके में सब छाया की तरह दिख र...

काश होती कमीज पर कविता- शिव शंकर मिश्र

📖 'काश होती कमीज पर कविता' शिव शंकर मिश्र का कहानी संग्रह 🌟 पुस्तक परिचय 'काश होती कमीज पर कविता'' सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिव शंकर मिश्र की 7 चुनिंदा कहानियों का एक सशक्त संग्रह है। यह कृति समाज के कड़वे यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और आम आदमी के नैतिक संघर्ष को बेबाक ढंग से रेखांकित करती है। 📚 संग्रह की कहानियाँ: काश होती कमीज पर कविता: आम आदमी की साधारण ज़रूरतों के पीछे छिपा गहरा जीवन-दर्शन। पखावज वृत्तांत: कला, संगीत और जीवन की व्यावहारिक जटिलताओं का चित्रण। हराम की नहीं: घोर अभावों के बीच आत्मसम्मान और ईमानदारी की प्रेरक गाथा। पात्रता: सामाजिक योग्यता के मुखौटों और इंसानी चरित्र का सूक्ष्म विश्लेषण। जश्न्: शोषक व्यवस्था के बीच भी जीवन जीने और खुशी तलाशने की जिद। चिता पर मंथावा: खोखली सामाजिक रीतियों और यथार्थ पर मर्मभेदी प्रहार। जालिम: सत्ता के अहंकार और क्रूरता के खिलाफ आम इंसान का मूक संघर्ष। ✍ लेखक के बारे में शिव शंकर मिश्र हिंदी साहित्य के यथार्थवादी रचनाकार हैं। इनकी आडंबरहीन शैली पाठकों को झकझोरती है और समाज के...

हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ...

  शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा पुस्तक - अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह), कहानीकार - शिवशंकर मिश्र प्रकाशक - सहयात्रा प्रकाशन, प्रा. लिमिटेड, सी - ५२ / जेड - ३, दिलशाद गार्डन, नयी दिल्ली - ११००९५ समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है, जो किसी को भी नहीं दुहराती, न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियां कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी है। संभवतः इसीलिए उनके कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी अत्यंत गंभीर किन्तु, अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है। उनकी कहानियां अपने पहले पाठ के बाद भी इस टिप्पणी की तरह पढ़ने को बची रह जाती हैं कि घटना के वास्तविक कारण का अभी पता लगाया जा रहा है।   शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहान...

'सतगुर हमसूँ रीझि करि', सन्दर्भ : प्रो0 रामनारायण शुक्ल

'सतगुर हमसूँ रीझि करि', सन्दर्भ : प्रो0 रामनारायण शुक्ल वह 30 जुलाई, 1983 का दिन था, जब मैं पी.एच0डी0 में प्रवेश के लिए बी0एच0यू0 गया था। दिन भर क्षमाशंकर जी के साथ शोध.निदेशक की तलाश करता रहा, पर किसी के पास नया शोधार्थी लेने की जगह नहीं थी। दोपहर ढल गयी थी। मेरे मन में हताशा थी और सिर में दर्द भी हो रहा था। मैं इलाहाबाद लौटना चाहता था। 'आइए कॉफी पी जाय।' - क्षमाशंकर जी ने कहा। 'काफी तो महँगी होगी।' 'नहीं भैया, महामना ने छात्रों के लिए सारी व्यवस्था की है। यहाँ खाने.पीने की चीजें काफी कम पैसों में मिल जाती हैं।' 'मैत्री जलपान गृह' और पूरे विश्वविद्यालय का स्थापत्य बहुत आकर्षक लग रहा था। मैं सब कुछ बेगानेपन के साथ देख रहा था। जहाँ तक मुझे याद है, दो रुपयों के कूपन से हम लोगों को एक.एक रसगुल्ला तथा कॉफी मिल गयी थी। शायद रसगुल्ले का या कॉफी का कुछ ऐसा असर हुआ कि मेरा सिरदर्द गायब हो गया, पर मन में हताशा और बेगानगी बनी रही। मैं इलाहाबाद के लिए लौटने की सोच ही रहा था कि एक युवक आया और मुझसे बोला, 'आपको डॉ0 अवधेश प्रधान बुला रहे हैं।' 'मैत...

मुनुआ की वीरगति

मुनुआ की वीरगति सुबह-सुबह गाँव में बमचख मच गया। मुनुआ चलते ट्रक से कूद पड़ा और नचकऊ पाँडे़ दरवाजे-दरवाजे थाली पीटकर फरियाद कर रहे हैं। ‘अररऽरऽ।‘ जिसने जहाँ सुनी यह खबर, वह वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया। अभी सूरज निकला भी नहीं था। लोग गोरुआरी-बछेरुआरी में लगे थे या लोटा लेकर शौच-मैदान के लिए निकल रहे थे। सब चौंक गये। ‘मरा कि बचा मुनुआ?‘ ‘मरा होता, तो नचकऊ किरिया-करम करते कि टाठी पीटकर गौंतरी लगाते?' ‘तो काहे की फरियाद कर रहे हैं नचकऊ?' ‘नचकऊ का कहना है कि गाँव के लड़कों ने धक्का देकर उनके लड़के को चलतिया टरक से गिरा दिया।’  - जगह-जगह बातें कर रहे थे लोग। ‘पर-पंचाइत का जमाना अब कहाँ रहा पाँड़े? आज-कल के लड़के कहो मानें कहो न मानें पंचों की बात। लेकिन ठीक है। तुम पंचाइत बैठा रहे हो, तो आ रहा हूँ मैं भी।‘ - गाय दुहकर लेरुआ ढीलते हुए बोले कामता पाठक। छोटे बच्चे नचकऊ के पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके लिए अपूर्व दृश्य था यह। उनमें से कई अभी सोकर उठे थे। आँखें मलते बच्चे सम्मोहित हुए चले जा रहे थे नचकऊ के पीछे-पीछे। सोनबरसा गाँव के लड़कों का वह झुंड रामलीला देखने जा रहा था, शंकरगढ़ की रामलीला। होने को ...